தलाल जलाकर नष्ट न की जा सकने वाली स्मृति का विश्वविद्यालय
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23 पुरट्टासी 2026
परिचय
एक विश्वविद्यालय नहीं, एक चिंतन-प्रणाली
बहुत-से लोग नालंदा को एक इमारत समझते हैं। नहीं। नालंदा एक चिंतन-प्रणाली है। आज के विश्वविद्यालय डिग्री देते हैं। नालंदा मनुष्यों का निर्माण करता था। आज हम “विश्वविद्यालय” कहते ही कक्षाएँ, परीक्षाएँ याद करते हैं। लेकिन पाँचवीं शताब्दी में पाटलिपुत्र के पास स्थित नालंदा में, विश्वविद्यालय स्वयं एक नगर के रूप में मौजूद था। दस हज़ार छात्र, दो हज़ार शिक्षक, दस हज़ार पत्थर के स्तंभ, सैकड़ों सभामंडप, तीन विशाल पुस्तकालय। यह कोई शैक्षणिक संस्थान नहीं, उस समय का इंटरनेट था।
पहला अनकहा सत्य — प्रवेश-परीक्षा की क्रूरता
आज विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए कठिन परीक्षा होती है। लेकिन नालंदा की परीक्षा-व्यवस्था अलग थी। वहाँ लिखित परीक्षा नहीं थी। द्वारपाल ही परीक्षक थे। द्वार पर खड़े विद्वान आने वाले से कठिन प्रश्न पूछते। उनसे हार गए तो भीतर प्रवेश नहीं। चीनी यात्री श्वानज़ांग लिखते हैं कि दस में से सात लोग द्वार से ही लौट जाते थे। यानी केवल तीस प्रतिशत ही भीतर प्रवेश कर पाते थे। इसका अर्थ क्या है? नालंदा ज्ञान नहीं बेचता था। वह केवल ज्ञान के लिए तड़पने वालों को ही अंदर आने देता था। आज के विश्वविद्यालय छात्रों को ढूँढते हैं। नालंदा छात्रों को चुनता था।
दूसरा सत्य — आवासीय छात्रावास की क्रांति
विश्व इतिहास में पहली बार, रहकर पढ़ने की व्यवस्था नालंदा ने ही बनाई। छात्र घर से आकर पढ़कर लौटते नहीं थे। वे वहीं रहते थे। वहीं खाते थे। वहीं वाद-विवाद करते थे। दस हज़ार छात्रों के लिए निःशुल्क भोजन, निःशुल्क वस्त्र, निःशुल्क औषधि, निःशुल्क आवास। इसका खर्च सैकड़ों गाँवों की आय से चलता था। राजाओं ने भूमि दी। व्यापारियों ने स्वर्ण दिया। क्यों? क्योंकि नालंदा एक विश्वविद्यालय नहीं, एक आस्था था। उस समय का समाज मानता था कि ज्ञान को बढ़ाना देश को बढ़ाना है।
तीसरा सत्य — तीन-स्तरीय पुस्तकालय की तकनीक
नालंदा के पुस्तकालय को ‘धर्मगंज’ कहा जाता था। उसमें तीन विशाल भवन थे। ‘रत्नसागर’— नौ मंज़िला, समुद्र की तरह ज्ञान को धारण करने वाला। ‘रत्नरंजक’— तारों से संबंधित ग्रंथ, खगोल-शास्त्र के ग्रंथ जहाँ थे। ‘रत्नोदधि’— जो ऊँचे स्थान पर था। कहा जाता है कि इन तीनों भवनों में नब्बे लाख ताड़पत्र-हस्तलिपियाँ थीं। एक ग्रंथ की नकल तैयार करने में छह महीने लगते। उन ग्रंथों की सुरक्षा के लिए अलग व्यवस्था थी। नीम का तेल लगाकर, हल्दी लगाकर, धुआँ दिखाकर उन्हें सुरक्षित रखा जाता था। यह आज के वातानुकूलित डेटा-सेंटर का प्राचीन रूप था।
चौथा सत्य — पाठ्यक्रम में मौजूद बहुआयामिता
बहुत-से लोग नालंदा को बौद्ध विश्वविद्यालय समझते हैं। यह गलत है। वहाँ केवल बौद्ध धर्म नहीं पढ़ाया जाता था। हिंदू वेद, जैन धर्म, सूक्ष्म-मापन विज्ञान, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, वास्तुकला, धातुकर्म, खगोल-शास्त्र— सब कुछ पढ़ाया जाता था। श्वानज़ांग उल्लेख करते हैं कि नालंदा में सौ प्रकार के पाठ्यक्रम थे। कोई छात्र केवल एक विषय नहीं पढ़ता था। वह दर्शन और चिकित्सा साथ पढ़ता। व्याकरण और खगोल-शास्त्र साथ पढ़ता। यह आज की अंतर्विषयक शिक्षा की शुरुआत थी।
पाँचवाँ सत्य — इसे क्यों नष्ट किया गया? ज्ञान से भय
1193 ईस्वी में बख्तियार खिलजी नामक सेनानायक ने नालंदा पर आक्रमण किया। पुस्तकालय तीन महीने तक जलता रहा। उसने जलाया क्यों? सोने के लिए? नहीं। इतिहासकार कहते हैं कि नालंदा ज्ञान का प्रतीक था, इसलिए उसे नष्ट करना चाहिए— ऐसा उन्होंने सोचा। किसी समाज की स्मृति मिटानी हो तो उसकी लाइब्रेरी जला देना पर्याप्त होता है। नालंदा की राख तीन महीने तक जलती रही— यह केवल कथा नहीं। यह इस बात का प्रमाण है कि वहाँ ज्ञान कितना सघन था। ताड़पत्र-हस्तलिपियाँ आसानी से नहीं जलतीं। वे धीरे-धीरे सुलगती हैं। यदि तीन महीने तक जलीं, तो सोचिए वहाँ कितने ग्रंथ रहे होंगे।
छठा सत्य — फिर से उठ खड़ा हुआ नालंदा
नालंदा के नष्ट होने के बाद उसके शिक्षक तिब्बत, जावा, चीन गए। वहाँ उन्होंने नए नालंदा खड़े किए। तिब्बत के कई मठ नालंदा की प्रतिकृतियाँ हैं। आज भारत सरकार ने नया नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित किया है। लेकिन पुराने नालंदा का वास्तविक पुनरुत्थान इमारत में नहीं, उसके विचार में है। सबके लिए निःशुल्क शिक्षा, रहकर पढ़ने की व्यवस्था, अनेक विषयों को जोड़कर पढ़ने की पद्धति, द्वार-परीक्षा जैसा कठोर गुणवत्ता-नियंत्रण— यही नालंदा की सच्ची संपदा है।
उपसंहार
नालंदा हमें क्या बताता है?
नालंदा कहता है— विश्वविद्यालय दीवारें नहीं होता। वह एक मनोवृत्ति है। ज्ञान को धन न बनाने की मनोवृत्ति। ज्ञान को बाँटने की मनोवृत्ति। आज हमने शिक्षा का व्यापार कर दिया है। नालंदा शिक्षा को तपस्या मानता था। इसी कारण वह आग में भी नष्ट नहीं हुआ। उसकी ताड़पत्र-हस्तलिपियाँ जलीं। लेकिन उसके विचार तिब्बत के पर्वतों में, जावा के द्वीपों में, चीनी मठों में आज भी जीवित हैं। एक विश्वविद्यालय को आग लगाकर नष्ट किया जा सकता है। लेकिन एक विचार को आग लगाकर नष्ट नहीं किया जा सकता। यही नालंदा है।
प्रकाशन: ‘अऱिवुप्पसी’ मीडियाஉங்கள் படைப்பைச் சமர்ப்பியுங்கள்
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